मजदूर वर्ग के साथ इतनी क्रूरता क्यों?

पिछले कुछ दिनों के भीतर मजदूरों के लिए मोदी सरकार ने एक के बाद एक कई सारे कानूनी प्रावधान लेकर आई है। ये प्रावधान बिल की तरह संसद में पेश हुए और इन पर औपचारिक कानूनी जामा पहनाना बाकी है। लेकिन, जैसे ही ये बिल संसद में पास हो जाते हैं, ये प्रभावी हो जाते हैं। इस तरह के प्रावधान कोविड महामारी के दौरान भी आये और वे कानून की तरह इस्तेमाल होते रहे। ऐसा लगता है, ये बिल भी इसी संरचना में लाये गये हैं।

श्रम संबंधी चार कोड बिल और अब मनरेगा को, संभवतः नाम से और तयशुदा इसके प्रावधान को खत्म करने की ओर ले जाना वाला वीबी-ग्राम बिल जिसे संक्षेप में रामजी बिल कहा जा रहा है, पास हुआ है। इन दोनों बिल में मजदूरों के लिए कुछ ऐसे प्रावधान हैं जो उनके अधिकार को ही खत्म करने की ओर ले जाते हैं। जैसे, फसल उत्पादन के चरम दिनों में नये प्रावधानों के तहत वीबी-ग्राम बिल काम नहीं देगा। ऐसे दिनों की संख्या 65 बताई गई है।

इसी तरह से चार श्रम कानूनों में लाये गये बदलाव में 300 तक मजदूर क्षमता वाली उद्यम संस्थानों में छंटनी, तालाबंदी जैसे मामलों में सरकार से पूर्व अनुमति लेने की जरूरत नहीं रहेगी। लेकिन, मजदूरों को संगठित होने के अधिकार पर कई तरह की पाबंदियां लगा दी गई हैं। जिसमें एक प्रावधान यह है कि हड़ताल पर जाने के 60 दिन पहले मालिक को सूचना देनी होगी।

ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूरों को लेकर जो उपयुक्त श्रमिक वेतन, या मजदूरी का मानक बनना चाहिए था, वह नहीं बना। लेकिन, ग्रामीण क्षेत्र में वीबी-ग्राम बिल में मजदूरों को 125 दिन काम का वादा कर दिया गया। इसी तरह, शहरी मजदूरों के लिए काम के घंटे को बढ़ाकर 12 घंटे की मंजूरी दे दी गई। यह बढ़ोत्तरी यह कहते हुए दी गई कि हफ्ते में यह 48 घंटे से अधिक नहीं होना चाहिए।

पिछले कुछ सालों में हमने मजदूर वर्ग की तबाही को देख रहे हैं। मजदूर अपनी गिरती कमाई, बेरोजगारी और सामाजिक असुरक्षा से जूझ रहा है। आज के दिन तक भारत के शहरों से लेकर गांव तक बुलडोजर बने मकानों, रिहाईशों को ढ़हाने का अभियान चल रहा है।

आवास की समस्या गहरे तौर पर जमीन की समस्या से जुड़ी हुई है। जिस देश की 80 प्रतिशत आबादी के पास ढंग का जमीन का टुकड़ा नहीं है, वहां लोगों को रिहाइश और खेती के लिए जमीन उपलब्ध कराने की बजाय उन्हें खदेड़ने, नेस्तनाबूद करने का अभियान चलाना कुछ और नहीं, उन्हें जमीन मालिकों, सरकारी अफसरों पर निर्भर बनाना और उनके रहमोंकरम पर ले जाने के लिए विवश करना है।

दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में कांग्रेस की सरकारों के समय तक ‘विकास’ के नाम पर बड़े पैमाने पर झुग्गी बस्तियों को उजाड़ने का काम शुरू हुआ था। उस समय विकास के परिप्रेक्ष्य पर बातें चल रही थीं। लेकिन, मोदी सरकार के आने के बाद ये सारी बहसें काूननी अधिकार और अवैध अतिक्रमण के तहत चली गई। मजदूरों के घरों को जिस बेरहमी से तोड़ा गया और उन्हें खदेड़ दिया गया, वह एक मिसाल है। दिल्ली जैसे शहर में चंद वर्षों में ही बुलडोजर नीति के तहत 10 लाख से ऊपर लोगों को बेघर कर दिया गया।

किसी भी देश के उत्पादन पद्धति में मजदूर वर्ग अनिवार्य हिस्सा है और उसके श्रम से उत्पादन का मुनाफा पैदा होता है। भारत में खेती आज भी सबसे बड़ा श्रम-रोजगार का केंद्र बना हुआ है। दूसरा हिस्सा उद्योग है जिसमें मजदूरों का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र में काम करता है। मोदी सरकार की नोटबंदी और फिर कोविड के दौरान किया गया लाॅकडाउन इस अनौपचारिक क्षेत्र, जिसमें मुख्यत एमएसएमई काम करते हैं, तबाह होने की ओर चले गये।

बहुत सारे अर्थशास्त्रियों के सुझावों के बावजूद मोदी सरकार ने इस क्षेत्र के लिए जो कदम उठाने चाहिए थे, उसे नहीं उठाया। लेकिन, जीडीपी के मापन के समय में इस क्षेत्र की गिनती विकसित होते हुए केंद्र की तरह देखा गया। इसे लेकर न सिर्फ भारत के अर्थशास्त्री, साथ विश्वबैंक की ओर से भी सुझाव दिये गये। लेकिन, जीडीपी को नापने का तरीका नहीं बदला गया। भारत के अर्थशास्त्री विभिन्न मीडिया माध्यमों से बात करते रहे जिसका कोई खास असर नहीं हुआ।

लेकिन, विश्वबैंक ने भारत की ओर से जारी किये आंकड़ों को संदेहास्पद की श्रेणी में डाल दिया। सवाल यही है कि इस सबका असर क्या पड़ा? हम इस बीच डालर के मुकाबले रूपये का गिरना पढ़ रहे हैं। औद्योगिक विकास की जो रिपोर्ट आ रही है उसमें बड़े उद्योग विकसित होते हुए दिख रहे हैं। लेकिन, बाजार में कोई सरगर्मी दिखाई नहीं दे रही है। बेरोजगारी के आंकड़े डरावने हैं।

नये श्रम कानून किन उद्योगों को फायदा पहुंचाने जा रहे हैं? क्या ये छोटे उद्यमों को बढ़ावा देने के लिए हैं? क्या ये ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े भू मालिकों को मजदूरों से अपनी शर्तों पर काम कराने के लिए हैं? यहां यह याद रखना होगा कांग्रेस के समय में ग्रामीण क्षेत्रों में लागू हुआ मनेरगा रोजगार की गारंटी देता था न कि खेतिहर समुदायों के यहां काम करने कोई शर्तिया पाबंदी। यहां ग्रामीण क्षेत्र में फसल के दिनों में 65 दिन काम न देने की शर्त दी गई है। यदि यही है तब भारत के विकास की दिशा क्या है?

नये श्रम कानून, जो शहरी और ग्रामीण क्षेत्र दोनों के लिए लाये गये हैं उसके कुछ बिंदुओं को रेखांकित कर पढ़ने से साफ होता है: खेती में मूलभूत सुधार और खेतिहर समूहों को ठोस लाभ देेने की बजाय उन्हें सस्ते मजूदर उपलब्ध कराने वाले उपाय अधिक दिख रहे हैं। एमएसएमई को आर्थिक संसाधन और टेक्नोलाॅजी की सुविधा उपलब्ध कराने की बजाय उन्हें सस्ता मजदूर उपलब्ध कराया जा रहा है।

मध्यम और उच्च-मध्यम कंपनियों को नई तकनीक के तहत मजदूर घटाने की छूट देना और उन्हें छोटे उद्यम समूहों की ओर ठेलने की नीति अपनाई जा रही है जिससे ऊपरी समूहों के लाभ में तेजी से वृद्धि हो सके।

दूसरी ओर आवास की समस्या को गहरा बनाकर और परिवहन, स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं को मंहगा करते हुए मजदूर वर्ग को अधिक असुरक्षित बनाये रखना, उनके संगठित होने के अधिकार और क्षमता को कम करना, रोजगार को अनिश्चित बनाये रखने की नीति बनाई जा रही है जिससे मजदूर वर्ग श्रम तो करे लेकिन उससे पैदा होने वाली स्थितियों से कटकर रहे और शहरी जीवन का हिस्सा न बन सके।

यही स्थिति गांव में बनाये रखने की है जिसमें वह काम के लिए सीधे सरकार पर और गांव के खेत मालिकों पर निर्भर रहे।
आधुनिक पूंजीवादी समाज में मजदूर वर्ग ही वह पहला समूह था जिसने विचार के आधार पर खुद को संगठित किया और न सिर्फ राष्ट्र की अवधारणा को नया रूप दिया, इसने अपने नेतृत्व में एक नये तरह का राज्य बनाकर उदाहरण पेश किया।

भारत में मजूदर और किसान वर्ग ने न सिर्फ उपनिवेशिक दौर में ब्रिटिश हुकूमत के दौर में लड़ते हुए राष्ट्र को आजाद कराने में शिरकत की, उसमें सबसे अधिक बलिदान भी दिया। यह किसान ही थे जो महात्मा गांधी को नील की खेती तक ले गये और नमक सत्याग्रह का रास्ता प्रशस्त किया। यह मजदूर वर्ग ही था जिसने भारत में पार्टियों को रूप दिया और उन्हें जीवंत बनाये रखा। आज देश की अधिकांश पार्टियां इन्हीं मजदूरों और गरीब किसानों को उनके अपने हाल पर छोड़ दिया है।

इसका सीधा नतीजा उनकी आत्महीन उपस्थिति में दिख रही है। भाजपा के नेतृत्व में चलने वाली मोदी सरकार जिस तरह से श्रम कानून और खेतिहर मजदूर कानून लेकर आई है, वह भारत में भले ही जगत सेठ पैदा कर ले, सूदखोरों की पूरी जमात खड़ा कर ले, भू-मालिकों को बाहुबली बनाकर खेतों पर नये सामंत पैदा कर ले और मर चुके रजवाड़ों की मूर्तियां स्थापित कर ले, …यह व्यवस्था चलने वाली नहीं है क्योंकि यह चल ही नहीं सकती है।

आज का फासीवाद का दौर नहीं है, कल्ट का दौर नहीं है, यह खुद के आत्ममुग्ध रहने का दौर नहीं है, …यह दौर पूंजीवाद और समाजवाद के दौर से आगे जा चुका है। श्रमिक वर्ग को निरीह बना देने से एक वर्ग के तौर पर वह निरीह नहीं रह सकता। चेतना व्यक्ति से नहीं समूह से पैदा होती है। एक पूरा समूह जब नीति बनाकर बहुसंख्य आबादी को अपनी नीतियों से उत्पीड़ित करेगा, जब मनमाने तरीके से बुलडोजर और छंटनी की चाल चलेगा, तब इससे बनने वाले विचार को रोकना संभव नहीं होगा।

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